Monday, October 7, 2013

अनकही बात







सिलसिले तो बहुत हैं 
मेरी अनकही बातों के 
अधूरी चाहतों के 
पर सुन ना सकोगे तुम
मुझे गिरा दोगे आँख से 
आँसू की बूँद सा 
समझ ना सकोगे 
क्यों रह जाती हैं अकसर 
चाहते अधूरी 
मेरे अनसुलझे रिश्तों की 
डोर में उलझ जाओगे तुम
जानती हूँ ना सुलझा सकोगे तुम
नही चाहती करना
अपने अकेलेपन के विस्तार
से तुम्हे हैरान
क्योंकि इस दुनिया में
ना ढूँढ पाओगे मुझे तुम

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