सिलसिले तो बहुत हैं
मेरी अनकही बातों के
अधूरी चाहतों के
पर सुन ना सकोगे तुम
मुझे गिरा दोगे आँख से
आँसू की बूँद सा
समझ ना सकोगे
क्यों रह जाती हैं अकसर
चाहते अधूरी
मेरे अनसुलझे रिश्तों की
डोर में उलझ जाओगे तुम
जानती हूँ ना सुलझा सकोगे तुम
नही चाहती करना
अपने अकेलेपन के विस्तार
से तुम्हे हैरान
क्योंकि इस दुनिया में
ना ढूँढ पाओगे मुझे तुम
मेरी अनकही बातों के
अधूरी चाहतों के
पर सुन ना सकोगे तुम
मुझे गिरा दोगे आँख से
आँसू की बूँद सा
समझ ना सकोगे
क्यों रह जाती हैं अकसर
चाहते अधूरी
मेरे अनसुलझे रिश्तों की
डोर में उलझ जाओगे तुम
जानती हूँ ना सुलझा सकोगे तुम
नही चाहती करना
अपने अकेलेपन के विस्तार
से तुम्हे हैरान
क्योंकि इस दुनिया में
ना ढूँढ पाओगे मुझे तुम
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