Wednesday, October 9, 2013

सब बीत गया

वक्त तो जैसे पंख लगा कर उड गया
बाबुल तेरा आँगन तो पराया हो गया

वो बड़ी सी गुड़िया छोटा सा गुड्डा
सुंदर सी फ्रांके टूटी सी कुछ
रंगीन पैंसिलें वो सब
बेगाना हो गया

सोने का वो कमरा
जिसमे खुलती थी तेरी ही
आवाज़ से आँखें
उसमें बैठे
एक अरसा बीत गया

चाय की चुस्की के
साथ गुजरती थी शाम
खुली छत पर
वो सब पराया हो गया

कुकर की वो सीटी
रोटी की सोंधी महक
माँ तेरे हाथ का खाना खाएँ
एक जमाना बीत गया

चले गए तुम दोनों
दूर् अनंत मॆं
"खुश रहो फूलोंफलो बिटिया"
ये आशीर्वाद पाने को अब
ये मन तरस गया

बाबुल तेरा आँगन छूट गया
कल तक तो था सब
पर आज लगे कि
मुट्ठी से रेत सा
सब फिसल गया

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