Thursday, April 19, 2018





उस देश को बिटिया ना दीजो
जिस में वो अपनी माँ की आँखों में
उसके पूर्णता का एहसास नहीं
बल्कि एक गिरता आंसू हो

जिसमें वो पिता का अभिमान नहीं
असमय उसके कंधो का बोझ हो
चाचा मामा की आँखों में हवस की वजह हो

बिटिया ना दीजो
जब उसका बचपन लड़की
होने से बदल जाये
अपने ही घर में उसे छुप कर
जीना पड़े जाये

बिटिया ना दीजो उस देश को
जहाँ उसकी मासूमियत
बाँटी जाती हो धर्मों में
राजनीति की नाम पर
उसके इंसान होने का
अधिकार भी कुचल दिया जाता हो

ऐ खुदा बस ये दुआ कबूल कर मेरी


-एक मासूम बच्ची

Friday, December 27, 2013












लम्हे और ज़ख्म का असर कुछ ऐसा है
कि देर से ही दर्द देता है ................











यूँ ही बने रहने दो हँसी मेरी...............
कि समंदर में तूफान कम ही आते हैं

Thursday, October 10, 2013

ढूँढती हूँ

बादलों की आँख मिचौली
सूरज से और
धूप की मुझसे
ढूँढती  हूँ छाव
जहाँ हो बादलों का
भी आना जाना

गौरेय्या की छुपा छूपी
पेड़ों के झुरमुट से और
सर्द हवाओं की मुझसे
ढूँढती हूँ एक आड़
जहाँ हूँ  गौरेय्या का
भी फुदकना

गजक, रेवड़ी, मूँगफली
की जिद मिठास से और    
अदरक की चाय की मुझसे
ढूँढती हूँ कोई साथ
जब मुमकिन हो
कॉफी का भी मजा लेना            

चुटकुले किस्से की लड़ाई
भरी दुपहर से
चाट पकौड़े के
के नुक्कड़  की मुझसे
ढूँढती हूँ  कुछ साथी
जहाँ हो सके
कुछ सुनना सुनाना
          

Wednesday, October 9, 2013

सब बीत गया

वक्त तो जैसे पंख लगा कर उड गया
बाबुल तेरा आँगन तो पराया हो गया

वो बड़ी सी गुड़िया छोटा सा गुड्डा
सुंदर सी फ्रांके टूटी सी कुछ
रंगीन पैंसिलें वो सब
बेगाना हो गया

सोने का वो कमरा
जिसमे खुलती थी तेरी ही
आवाज़ से आँखें
उसमें बैठे
एक अरसा बीत गया

चाय की चुस्की के
साथ गुजरती थी शाम
खुली छत पर
वो सब पराया हो गया

कुकर की वो सीटी
रोटी की सोंधी महक
माँ तेरे हाथ का खाना खाएँ
एक जमाना बीत गया

चले गए तुम दोनों
दूर् अनंत मॆं
"खुश रहो फूलोंफलो बिटिया"
ये आशीर्वाद पाने को अब
ये मन तरस गया

बाबुल तेरा आँगन छूट गया
कल तक तो था सब
पर आज लगे कि
मुट्ठी से रेत सा
सब फिसल गया

Monday, October 7, 2013

अनकही बात







सिलसिले तो बहुत हैं 
मेरी अनकही बातों के 
अधूरी चाहतों के 
पर सुन ना सकोगे तुम
मुझे गिरा दोगे आँख से 
आँसू की बूँद सा 
समझ ना सकोगे 
क्यों रह जाती हैं अकसर 
चाहते अधूरी 
मेरे अनसुलझे रिश्तों की 
डोर में उलझ जाओगे तुम
जानती हूँ ना सुलझा सकोगे तुम
नही चाहती करना
अपने अकेलेपन के विस्तार
से तुम्हे हैरान
क्योंकि इस दुनिया में
ना ढूँढ पाओगे मुझे तुम

Wednesday, August 14, 2013

ऐ जिंदगी





 जिंदगी... तेरी खोज में

एक बार मैं फिर निकली
अब तक जीवन की
जिन तपती राहों में
छाया बनकर साथ रही
समय की ओट में
तू जाने कहां छुप गई 

कभी चांदनी बन छिटक गई
अमावस की काली रातों में
तो कभी बसंत बन
खिल गई
पतझड़ की उदास शामों में

जब ढूंढा तुझे दोस्तों में
तो पल दो पल की साथी बन
गुम हो गयी भीड़ में

जब ढूंढा तुझे यादों में
तो उभरी कभी दर्द बनकर 
कभी मुस्कुराहट बनकर
ढलक गई आसुंओं में

जब ढूंढा तुझे रिश्तों में
जीवन से बंधी डोर
उलझकर रह गई
धागों में

बस जिंदगी
तू यूं ही गुजर गयी