ऐ जिंदगी... तेरी खोज में
एक बार मैं फिर निकली
अब तक जीवन की
जिन तपती राहों में
छाया बनकर साथ रही
समय की ओट में
तू जाने कहां छुप गई
कभी चांदनी बन छिटक गई
अमावस की काली रातों में
तो कभी बसंत बन
खिल गई
पतझड़ की उदास शामों में
जब ढूंढा तुझे दोस्तों में
तो पल दो पल की साथी बन
गुम हो गयी भीड़ में
जब ढूंढा तुझे यादों में
तो उभरी कभी दर्द बनकर
कभी मुस्कुराहट बनकर
ढलक गई आसुंओं में
जब ढूंढा तुझे रिश्तों में
जीवन से बंधी डोर
उलझकर रह गई
धागों में
बस जिंदगी
तू यूं ही गुजर गयी

