Wednesday, August 14, 2013

ऐ जिंदगी





 जिंदगी... तेरी खोज में

एक बार मैं फिर निकली
अब तक जीवन की
जिन तपती राहों में
छाया बनकर साथ रही
समय की ओट में
तू जाने कहां छुप गई 

कभी चांदनी बन छिटक गई
अमावस की काली रातों में
तो कभी बसंत बन
खिल गई
पतझड़ की उदास शामों में

जब ढूंढा तुझे दोस्तों में
तो पल दो पल की साथी बन
गुम हो गयी भीड़ में

जब ढूंढा तुझे यादों में
तो उभरी कभी दर्द बनकर 
कभी मुस्कुराहट बनकर
ढलक गई आसुंओं में

जब ढूंढा तुझे रिश्तों में
जीवन से बंधी डोर
उलझकर रह गई
धागों में

बस जिंदगी
तू यूं ही गुजर गयी   

एक प्रश्न

मैं नही पूछूँगी कि
मैं ही क्यों 
अकेली नही हूँ मैं 
अनगिनत हैं मेरे साथ 
टूटी, पीड़ित, घबराइ 
जिनके कदम भी ना संभले 
जीवन की राहों पर 
जो थी जीवन आँगन में
तुलसी सी पावन
मिटा दी गयी
ना जाने कितनी दामिनी

बस मुझे कहना है इतना कि 
बिठा तो दिया मन्दिर, कंदराओ 
में देवी बना 
गिर गए च्ररण में
शक्ति के लिए, शांति के लिए 
पर नही  कर पाए स्वीकार
उसी की छवि को इनसान समझ कर 
माना भूल जाते हो 
पुरुष होने के गुमान में 
हूँ किसी कि बेटी, माँ, 
बहन,पत्नी, दोस्त
पर क्यों भूल जाते  हो 
मैं भी हूँ उसी की रचना
जिसने बनाया सबको ,
बनी रहने दो मेरी 
इनसान होने की गरिमा 
कर लो स्वीकार मुझे 
अपनी संगिनी सा 
ना कि माध्यम 
एक साधन पूर्ति का  

Wednesday, August 7, 2013

जुस्तुजु




जुस्तुजु पर अपनी हैरानी होती है
मंजिले तो हैं कई मोड़ों के बाद 

क्योंकर ये आँखें देख् लेती हैं
अंधेरों में भी 

वास्ता नही  होता  जिन राहों से 
क्योंकर दिल ढूँढ लेता है, उन्हें,
मंजिलों के लिए 

ख़ुद-ब-ख़ुद बढ़ चलते हैं 
क्योंकर ये कदम 
उन रास्तों पर जिनके लिए 
दुनिया से कर गए किनारा हम

इम्तिहान लेता है 
क्योंकर खुदा कभी  
उन मंजिलों के लिए 
जिनकी बस जुस्तुजु ही की है
क्योंकर रुला देती है 
ये तन्हाई
रह जाते हैं जब राहों में अकेले





जुस्तुजु पर अपनी हैरानी होती है 

Monday, August 5, 2013

कुछ इस तरह



कुछ इस तरह...........
सुबह फैली खामोशी से 
कि पत्ते, तिनके भी चुप हैं
शायद किसी शाम की तन्हाई       
की आह्ट चली गयी आयी रात पार कर के
कुछ इस तरह.............
दूर् तक फैला है विस्तार 
पर नजर नही आती कोई छाया 
हो गए हैं दूर् इतने साये भी कि 
छितिज़ पर भी नही दिखती परछाई

कुछ इस तरह.........
भर के बरसी है बदली   
पर फिर भी गीली नही बारिश 
चुरा ली है इसकी  नमी
खामोश आँखों के आँसुओं ने
कुछ इस तरह..............
बातों के सिलसिले हैं लंबे 
हँसी, प्यार सब होता है पर,
फ़ासले बढ़ गए हैं इतने 
कि मन ही सुन पाता है आवाजें