Monday, August 5, 2013

कुछ इस तरह



कुछ इस तरह...........
सुबह फैली खामोशी से 
कि पत्ते, तिनके भी चुप हैं
शायद किसी शाम की तन्हाई       
की आह्ट चली गयी आयी रात पार कर के
कुछ इस तरह.............
दूर् तक फैला है विस्तार 
पर नजर नही आती कोई छाया 
हो गए हैं दूर् इतने साये भी कि 
छितिज़ पर भी नही दिखती परछाई

कुछ इस तरह.........
भर के बरसी है बदली   
पर फिर भी गीली नही बारिश 
चुरा ली है इसकी  नमी
खामोश आँखों के आँसुओं ने
कुछ इस तरह..............
बातों के सिलसिले हैं लंबे 
हँसी, प्यार सब होता है पर,
फ़ासले बढ़ गए हैं इतने 
कि मन ही सुन पाता है आवाजें

1 comment:

  1. बहुत ही भावपूर्ण रचना ..

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