मैं नही पूछूँगी कि
मैं ही क्यों
अकेली नही हूँ मैं
अनगिनत हैं मेरे साथ
टूटी, पीड़ित, घबराइ
जिनके कदम भी ना संभले
जीवन की राहों पर
जो थी जीवन आँगन में
तुलसी सी पावन
मिटा दी गयी
ना जाने कितनी दामिनी
बस मुझे कहना है इतना कि
बिठा तो दिया मन्दिर, कंदराओ
में देवी बना
गिर गए च्ररण में
शक्ति के लिए, शांति के लिए
पर नही कर पाए स्वीकार
उसी की छवि को इनसान समझ कर
माना भूल जाते हो
पुरुष होने के गुमान में
हूँ किसी कि बेटी, माँ,
बहन,पत्नी, दोस्त
पर क्यों भूल जाते हो
मैं भी हूँ उसी की रचना
जिसने बनाया सबको ,
बनी रहने दो मेरी
इनसान होने की गरिमा
कर लो स्वीकार मुझे
अपनी संगिनी सा
ना कि माध्यम
एक साधन पूर्ति का

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