जुस्तुजु पर अपनी हैरानी होती है
मंजिले तो हैं कई मोड़ों के बाद
क्योंकर ये आँखें देख् लेती हैं
अंधेरों में भी
वास्ता नही होता जिन राहों से
क्योंकर दिल ढूँढ लेता है, उन्हें,
मंजिलों के लिए
ख़ुद-ब-ख़ुद बढ़ चलते हैं
क्योंकर ये कदम
उन रास्तों पर जिनके लिए
दुनिया से कर गए किनारा हम
इम्तिहान लेता है
क्योंकर खुदा कभी
उन मंजिलों के लिए
जिनकी बस जुस्तुजु ही की है
क्योंकर रुला देती है
ये तन्हाई
रह जाते हैं जब राहों में अकेले
जुस्तुजु पर अपनी हैरानी होती है
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