जीवन में दर्द के, बीते लम्हों के, अनछुये एहसासो के ना जाने कितने सागर हिलोरे ले रहे हैं बस कभी इनकी कुछ बूँदें पन्नों पर आ जाती हैं और शब्द जुड़ कर कभी कविता का रुप ले लेते हैं और कभी यूँ ही सूख जाते हैं
Friday, December 27, 2013
Thursday, October 10, 2013
ढूँढती हूँ
बादलों की आँख मिचौली
सूरज से और
धूप की मुझसे
ढूँढती हूँ छाव
जहाँ हो बादलों का
भी आना जाना
गौरेय्या की छुपा छूपी
पेड़ों के झुरमुट से और
सर्द हवाओं की मुझसे
ढूँढती हूँ एक आड़
जहाँ हूँ गौरेय्या का
भी फुदकना
गजक, रेवड़ी, मूँगफली
की जिद मिठास से और
अदरक की चाय की मुझसे
ढूँढती हूँ कोई साथ
जब मुमकिन हो
कॉफी का भी मजा लेना
चुटकुले किस्से की लड़ाई
भरी दुपहर से
चाट पकौड़े के
के नुक्कड़ की मुझसे
ढूँढती हूँ कुछ साथी
जहाँ हो सके
कुछ सुनना सुनाना
सूरज से और
धूप की मुझसे
ढूँढती हूँ छाव
जहाँ हो बादलों का
भी आना जाना
गौरेय्या की छुपा छूपी
पेड़ों के झुरमुट से और
सर्द हवाओं की मुझसे
ढूँढती हूँ एक आड़
जहाँ हूँ गौरेय्या का
भी फुदकना
गजक, रेवड़ी, मूँगफली
की जिद मिठास से और
अदरक की चाय की मुझसे
ढूँढती हूँ कोई साथ
जब मुमकिन हो
कॉफी का भी मजा लेना
चुटकुले किस्से की लड़ाई
भरी दुपहर से
चाट पकौड़े के
के नुक्कड़ की मुझसे
ढूँढती हूँ कुछ साथी
जहाँ हो सके
कुछ सुनना सुनाना
Wednesday, October 9, 2013
सब बीत गया
वक्त तो जैसे पंख लगा कर उड गया
बाबुल तेरा आँगन तो पराया हो गया
वो बड़ी सी गुड़िया छोटा सा गुड्डा
सुंदर सी फ्रांके टूटी सी कुछ
रंगीन पैंसिलें वो सब
बेगाना हो गया
सोने का वो कमरा
जिसमे खुलती थी तेरी ही
आवाज़ से आँखें
उसमें बैठे
एक अरसा बीत गया
चाय की चुस्की के
साथ गुजरती थी शाम
खुली छत पर
वो सब पराया हो गया
कुकर की वो सीटी
रोटी की सोंधी महक
माँ तेरे हाथ का खाना खाएँ
एक जमाना बीत गया
चले गए तुम दोनों
दूर् अनंत मॆं
"खुश रहो फूलोंफलो बिटिया"
ये आशीर्वाद पाने को अब
ये मन तरस गया
बाबुल तेरा आँगन छूट गया
कल तक तो था सब
पर आज लगे कि
मुट्ठी से रेत सा
सब फिसल गया
बाबुल तेरा आँगन तो पराया हो गया
वो बड़ी सी गुड़िया छोटा सा गुड्डा
सुंदर सी फ्रांके टूटी सी कुछ
रंगीन पैंसिलें वो सब
बेगाना हो गया
सोने का वो कमरा
जिसमे खुलती थी तेरी ही
आवाज़ से आँखें
उसमें बैठे
एक अरसा बीत गया
चाय की चुस्की के
साथ गुजरती थी शाम
खुली छत पर
वो सब पराया हो गया
कुकर की वो सीटी
रोटी की सोंधी महक
माँ तेरे हाथ का खाना खाएँ
एक जमाना बीत गया
चले गए तुम दोनों
दूर् अनंत मॆं
"खुश रहो फूलोंफलो बिटिया"
ये आशीर्वाद पाने को अब
ये मन तरस गया
बाबुल तेरा आँगन छूट गया
कल तक तो था सब
पर आज लगे कि
मुट्ठी से रेत सा
सब फिसल गया
Monday, October 7, 2013
अनकही बात
सिलसिले तो बहुत हैं
मेरी अनकही बातों के
अधूरी चाहतों के
पर सुन ना सकोगे तुम
मुझे गिरा दोगे आँख से
आँसू की बूँद सा
समझ ना सकोगे
क्यों रह जाती हैं अकसर
चाहते अधूरी
मेरे अनसुलझे रिश्तों की
डोर में उलझ जाओगे तुम
जानती हूँ ना सुलझा सकोगे तुम
नही चाहती करना
अपने अकेलेपन के विस्तार
से तुम्हे हैरान
क्योंकि इस दुनिया में
ना ढूँढ पाओगे मुझे तुम
मेरी अनकही बातों के
अधूरी चाहतों के
पर सुन ना सकोगे तुम
मुझे गिरा दोगे आँख से
आँसू की बूँद सा
समझ ना सकोगे
क्यों रह जाती हैं अकसर
चाहते अधूरी
मेरे अनसुलझे रिश्तों की
डोर में उलझ जाओगे तुम
जानती हूँ ना सुलझा सकोगे तुम
नही चाहती करना
अपने अकेलेपन के विस्तार
से तुम्हे हैरान
क्योंकि इस दुनिया में
ना ढूँढ पाओगे मुझे तुम
Wednesday, August 14, 2013
ऐ जिंदगी
ऐ जिंदगी... तेरी खोज में
एक बार मैं फिर निकली
अब तक जीवन की
जिन तपती राहों में
छाया बनकर साथ रही
समय की ओट में
तू जाने कहां छुप गई
कभी चांदनी बन छिटक गई
अमावस की काली रातों में
तो कभी बसंत बन
खिल गई
पतझड़ की उदास शामों में
जब ढूंढा तुझे दोस्तों में
तो पल दो पल की साथी बन
गुम हो गयी भीड़ में
जब ढूंढा तुझे यादों में
तो उभरी कभी दर्द बनकर
कभी मुस्कुराहट बनकर
ढलक गई आसुंओं में
जब ढूंढा तुझे रिश्तों में
जीवन से बंधी डोर
उलझकर रह गई
धागों में
बस जिंदगी
तू यूं ही गुजर गयी
एक प्रश्न
मैं नही पूछूँगी कि
मैं ही क्यों
अकेली नही हूँ मैं
अनगिनत हैं मेरे साथ
टूटी, पीड़ित, घबराइ
जिनके कदम भी ना संभले
जीवन की राहों पर
जो थी जीवन आँगन में
तुलसी सी पावन
मिटा दी गयी
ना जाने कितनी दामिनी
बस मुझे कहना है इतना कि
बिठा तो दिया मन्दिर, कंदराओ
में देवी बना
गिर गए च्ररण में
शक्ति के लिए, शांति के लिए
पर नही कर पाए स्वीकार
उसी की छवि को इनसान समझ कर
माना भूल जाते हो
पुरुष होने के गुमान में
हूँ किसी कि बेटी, माँ,
बहन,पत्नी, दोस्त
पर क्यों भूल जाते हो
मैं भी हूँ उसी की रचना
जिसने बनाया सबको ,
बनी रहने दो मेरी
इनसान होने की गरिमा
कर लो स्वीकार मुझे
अपनी संगिनी सा
ना कि माध्यम
एक साधन पूर्ति का
Wednesday, August 7, 2013
जुस्तुजु
जुस्तुजु पर अपनी हैरानी होती है
मंजिले तो हैं कई मोड़ों के बाद
क्योंकर ये आँखें देख् लेती हैं
अंधेरों में भी
वास्ता नही होता जिन राहों से
क्योंकर दिल ढूँढ लेता है, उन्हें,
मंजिलों के लिए
ख़ुद-ब-ख़ुद बढ़ चलते हैं
क्योंकर ये कदम
उन रास्तों पर जिनके लिए
दुनिया से कर गए किनारा हम
इम्तिहान लेता है
क्योंकर खुदा कभी
उन मंजिलों के लिए
जिनकी बस जुस्तुजु ही की है
क्योंकर रुला देती है
ये तन्हाई
रह जाते हैं जब राहों में अकेले
जुस्तुजु पर अपनी हैरानी होती है
Monday, August 5, 2013
कुछ इस तरह
कुछ इस तरह...........
सुबह फैली खामोशी से
कि पत्ते, तिनके भी चुप हैं
शायद किसी शाम की तन्हाई
की आह्ट चली गयी आयी रात पार कर के
कुछ इस तरह.............
दूर् तक फैला है विस्तार
पर नजर नही आती कोई छाया
हो गए हैं दूर् इतने साये भी कि
छितिज़ पर भी नही दिखती परछाई
कुछ इस तरह.........
भर के बरसी है बदली
पर फिर भी गीली नही बारिश
चुरा ली है इसकी नमी
खामोश आँखों के आँसुओं ने
कुछ इस तरह..............
बातों के सिलसिले हैं लंबे
हँसी, प्यार सब होता है पर,
फ़ासले बढ़ गए हैं इतने
कि मन ही सुन पाता है आवाजें
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